CHAPTER 1 : LIFE RUNNING ON EMPTY
19 June 2026, अस्पताल की छत सफ़ेद, फीके चौकोर खानों का एक ग्रिड थी, जिस पर टिमटिमाती हुई फ्लोरोसेंट ट्यूबलाइट ऐसे भिनभिना रही थी जैसे आधी रात को कोई सुनसान सर्वर रूम गूंजता है।
मेरा नाम कंचन है, 9 दिन पहले मैं 23 साल का हुआ हूं। मेरी नौकरी माहीन के अंत में वेतन कम तनाव ज्यादा दे देती है, इस वक़्त, जब मैं इस ठंडे बिस्तर पर लेटा हूँ, मेरा शरीर किसी बेहद खराब तरीके से लिखे गए कंप्यूटर प्रोग्राम (कोड) की तरह लग रहा है जो अपने ही वजन और अंतर्विरोधों से क्रैश हो गया हो। मैं इस वॉर्ड में पूरी तरह अकेला हूँ, कोई दोस्त नहीं। ऑफिस का कोई सहकर्मी नहीं। मेरे माता-पिता को लगता है कि मैं अपने कमरे में सुरक्षित बैठा हूँ, कोडिंग कर रहा हूँ और एक बेहतर भविष्य की तरफ बढ़ रहा हूँ, उन्हें अंदाज़ा तक नहीं है कि मेरा नर्वस सिस्टम कई दिनों पहले ही दम तोड़ चुका है।
चिकित्सक इसे महज़ एक 'गंभीर संक्रमण' का नाम दे रहे हैं, वे मेरे भीतर उस बीमारी को टटोल रहे हैं जिसने इस जिस्म को लाचार कर दिया है। लेकिन जब मैं स्टैंड पर टंगी उस बोतल से दवा की एक-एक बूंद को कतरा-कतरा रिसते और आईवी ड्रिप के सहारे अपनी सूनी रगों में उतरते देखता हूँ, तो पलकों की कोरों से बहते ये गर्म आँसू कुछ और ही गवाही देते हैं।
ये आँसू चीखकर कहते हैं कि इस नासूर की शुरुआत मेरी आंतों से नहीं हुई थी। इसकी बुनियाद तो आज से ठीक एक साल पहले रखी जा चुकी थी—उसी शांत, गुमसुम सी वीकेंड लाइब्रेरी के किसी खामोश कोने में; स्ट्रीटलाइट्स की पीली रोशनी में तय किए जाने वाले उस दो किलोमीटर के रास्ते में , जहाँ कभी हम साथ चलते थे। और उस लड़की के साए में, जिसे मैंने अपनी जिंदगी का सबसे मुकम्मल दोस्त मान लिया था।
मुझे क्या मालूम था कि जिसे मैं अपना सबसे महफ़ूज़ ठिकाना समझ रहा था, वह दरअसल मेरे वजूद को तिनका-तिनका बिखेर देने वाला एक खामोश तूफ़ान थी।
आज इस प्लास्टिक की बोतल से टपकती दवाइयाँ बस उस ज़हर को बेअसर करने की नाकाम कोशिश कर रही हैं, जो जिस्म में नहीं, बल्कि भरोसे के उस मलबे के नीचे फैला है जिसे वह मेरे भीतर छोड़ गई थी।
लेकिन अप्रैल 2025 में, जब यह सब शुरू भी नहीं हुआ था, मेरी ज़िंदगी का हर दिन एक खाली डिब्बे की तरह था, जो अंदर से पूरी तरह खोखला था।
सुबह नौ से शाम छह बजे की मेरी डेस्क जॉब किसी जेल की तरह लगती थी। एक ऐसा टेक-स्टैक जिस पर काम करने में मेरा कोई दिल नहीं लगता था, और एक ऐसा मैनेजर जिसके लिए मैं कोई इंसान नहीं, बल्कि एक तयशुदा समय में काम डिलीवर करने वाला मशीन का हिस्सा था। ऑफिस की राजनीति, एक-दूसरे को पीछे धकेलने की होड़ और हर महीने मिलने वाली कम सैलरी ने मिलकर मेरे भीतर एक अजीब सी घबराहट (Anxiety) को जन्म दे दिया था।
मेरा दिमाग कभी शांत नहीं होता था। मैं हर छोटी बात को लेकर ओवरथिंकिंग के एक अंतहीन लूप (Infinite Loop) में फंस जाता था। क्या मैं ज़िंदगी भर इसी लो-पेइंग जॉब में फंसा रहूँगा? क्या मेरी तकनीकी क्षमताएँ यहीं खत्म हो जाएँगी?
इस मानसिक तनाव का सीधा असर मेरे शरीर पर होने लगा था। ......to read full story DM me on social media platform link mentioned above nenu bar.

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