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कोड 9198

 अप्रैल 2, 2011, सायं 7 बजे।

कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म उस शाम कुछ अलग था।
यह वही जगह थी—जहाँ आम दिनों में लोग बस आते-जाते हैं—थके हुए, जल्दी में, अपने-अपने सफ़रों में खोए हुए। लेकिन आज… आज हर कोई जैसे एक ही सफ़र पर था, एक ही दिशा में, एक ही पल की प्रतीक्षा में।

चारों ओर एक ही शोर गूंज रहा था—2011 क्रिकेट विश्व कप की कमेंट्री का।
पुराने रेडियो सेट्स, मोबाइल फोन, किसी के कंधे पर टिके स्पीकर—हर तरफ़ वही टूटी-फूटी आवाज़, जो हर कुछ सेकंड में भीड़ की धड़कनों को तेज़ कर देती थी।

चायवाला भी चाय कम, स्कोर ज़्यादा बता रहा था।
कुली अपना बोझ कुछ पल के लिए नीचे रखकर रेडियो के करीब आ गए थे।
अजनबी लोग एक-दूसरे से ऐसे बात कर रहे थे, जैसे बरसों की पहचान हो—
“कितना हुआ?”
“बस… अब होने ही वाला है…”



ट्रेन की घोषणाएँ बार-बार हो रही थीं, लेकिन वे इस शोर में कहीं खो जाती थीं।
मानो उस समय किसी को कहीं जाना ही नहीं था।

और इसी भीड़ के बीच…
एक व्यक्ति खड़ा था — मैं।

मैं भी क्रिकेट का प्रबल प्रेमी था,
पर उस दिन… न जाने क्यों, उस शोर से मेरा मन कटा हुआ था।

मेरे भीतर कुछ और ही चल रहा था—
भीतर एक बेचैनी थी—बिना वजह।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं किसी घने, अनजाने जंगल में भाग रहा हूँ—
पीछे कुछ अदृश्य-से भय मेरा पीछा कर रहे हों।
शरीर थककर चूर हो चुका था,
पर रुकने का साहस जैसे मुझसे छिन गया था।

शरीर विश्राम चाहता था,
मन ठहर जाना चाहता था,
पर परिस्थितियाँ मुझे निरंतर आगे धकेल रही थीं—
बिना रुके, बिना ठहरे।

मैंने स्वयं को सँभाला,
और भारी, थके हुए कदमों से चौरी-चौरा एक्सप्रेस के अपने कोच की ओर बढ़ गया।

डिब्बे में प्रवेश करते ही एक शीतल, कृत्रिम निस्तब्धता ने मुझे घेर लिया।
यह तीसरे वातानुकूलित श्रेणी का डिब्बा था — व्यवस्थित, शांत, और बाहरी कोलाहल से पूर्णतः अलग।

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से सरकने लगी।
दृश्य पीछे छूटते गए, और भीतर एक गहरा ठहराव उतर आया।

हल्की रोशनी में सब कुछ लगभग स्थिर-सा प्रतीत हो रहा था।
एसी की धीमी गूँज और पटरियों की लयबद्ध ध्वनि उस वातावरण को और गहरा बना रही थी।

मैं अपनी सीट पर आकर बैठ गया।

पर मन की अशांति वैसी ही बनी रही—
अडिग,  भीतर कहीं गहराई तक पसरी हुई।

तभी मेरी नज़र अनायास सामने उठी…और वहीं ठहर गई। सामने की सीट पर एक लड़की बैठी थी।

उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान थी—जो पूरे माहौल को थोड़ा सहज बना देती थी। ट्रेन के हल्के झटके उसके बालों को बार-बार चेहरे पर बिखेर देते, और वह उन्हें बड़ी सहजता से कानों के पीछे सरका लेती। 

उसकी आँखें गहरी थीं—पर शांत,

कुछ क्षण पहले तक मन जैसे किसी अनदेखे भय से भाग रहा था…
पर अब, न जाने क्यों,
वही मन पहली बार ठहरने लगा था।

मैं उसे देखता रहा—
जैसे लंबे समय बाद किसी सुरक्षित जगह पर आकर रुक गया हूँ।

कुछ देर तक हम दोनों के बीच मौन का एक अदृश्य परदा तना रहा।

मैं उसे चोर नज़रों से चुपके-चुपके देखता रहा।

शायद उसे इसका आभास हो गया था।

तभी वह अचानक बोली—

“गौतम आउट हो गया…”

मैं थोड़ी देर के लिए चौंक गया।

“क्या?” मैंने अनजाने में पूछ लिया।

वह हल्के से मुस्कुराई —

“आप सुन नहीं रहे थे क्या?

मैंने आसपास देखा। कहीं दूर किसी के मोबाइल से धीमी-सी कमेंट्री की आवाज़ आ रही थी।

“नहीं… मेरा ध्यान कहीं और था,” मैंने संकोच से कहा।

“पता है,”  — उसने जैसे ही कहा,

मैं एक पल के लिए ठहर गया।

नज़रें खुद-ब-खुद झुक गईं—
जैसे मैं पकड़ा गया हूँ।

मैंने हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश की,
पर वो टिक नहीं पाई।

उंगलियाँ अनजाने में सीट के किनारे से खेलती रहीं।

पर अब मौन पहले जैसा सहज नहीं था—उसमें हल्की-सी झिझक आ गई थी।

“क्रिकेट पसंद है आपको?” उसने बात को सहज बनाते हुए पूछा।

“बहुत… पर आज मन कहीं और उलझा हुआ है,” मैंने धीमे स्वर में कहा।

“कभी-कभी ऐसा होता है,” 

उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा,

“जब कोई नया दृश्य, किसी पुराने शौक से भी ज्यादा दिलचस्प लगने लगे।”

मैंने उसकी ओर देखा।

वह अब भी बाहर देख रही थी—

पर उसके शब्द जैसे सीधे मेरी ओर ही आए थे।

ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी।

और मुझे पहली बार एहसास हुआ—

यह सफ़र सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाने का नहीं है…

कुछ और भी है, जो धीरे-धीरे शुरू हो चुका है। 




-------------------Chapter 2-------------------- In progress 



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